📜 भारतीय इतिहास (History) टेस्ट
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1929 का लाहौर अधिवेशन और पूर्ण स्वराज प्रस्ताव: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक मोड़
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1929 का लाहौर अधिवेशन और पूर्ण स्वराज प्रस्ताव | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
Meta Description
जानिए 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज प्रस्ताव क्यों पारित किया गया, इसकी अध्यक्षता किसने की और इसका भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर क्या प्रभाव पड़ा।
Focus Keyphrase
लाहौर अधिवेशन 1929
परिचय
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 1929 का लाहौर अधिवेशन एक ऐतिहासिक घटना माना जाता है। इसी अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पहली बार पूर्ण स्वराज (Complete Independence) को अपना आधिकारिक लक्ष्य घोषित किया था। यह निर्णय भारत की आज़ादी की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम था।
लाहौर अधिवेशन 1929 कब और कहाँ हुआ?
- तिथि: दिसंबर 1929
- स्थान: लाहौर (अब पाकिस्तान में)
- नदी: रावी नदी के तट पर
यह अधिवेशन कांग्रेस के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण अधिवेशनों में से एक माना जाता है।
लाहौर अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की?
इस अधिवेशन की अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की थी। उस समय उनकी आयु लगभग 40 वर्ष थी और वे कांग्रेस के युवा नेतृत्व का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
पूर्ण स्वराज प्रस्ताव क्या था?
अधिवेशन में पारित प्रस्ताव के अनुसार:
- भारत का लक्ष्य अब केवल डोमिनियन स्टेटस नहीं रहेगा।
- भारत को ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए।
- ब्रिटिश सरकार के प्रति सहयोग की नीति समाप्त करने का संकेत दिया गया।
यह प्रस्ताव भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का प्रतीक था।
26 जनवरी 1930 को क्यों चुना गया?
लाहौर अधिवेशन में निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस (Independence Day) मनाया जाएगा।
उस दिन लोगों ने:
- राष्ट्रीय ध्वज फहराया,
- पूर्ण स्वराज की शपथ ली,
- ब्रिटिश शासन का विरोध किया।
बाद में 1950 में इसी तिथि को भारत का संविधान लागू किया गया और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस बन गई।
इस अधिवेशन के प्रमुख कारण
1. साइमन कमीशन का विरोध
1928 में आए साइमन कमीशन में कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था। इससे पूरे देश में असंतोष फैल गया।
2. नेहरू रिपोर्ट पर मतभेद
डोमिनियन स्टेटस को लेकर कांग्रेस के भीतर मतभेद थे। युवा नेता पूर्ण स्वतंत्रता चाहते थे।
3. जनभावना में परिवर्तन
देश की जनता अब ब्रिटिश शासन से पूरी तरह मुक्त होना चाहती थी।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर प्रभाव
लाहौर अधिवेशन के बाद:
मुख्य प्रभाव
- कांग्रेस का लक्ष्य स्पष्ट हो गया।
- जन आंदोलन को नई दिशा मिली।
- महात्मा गांधी ने आगे चलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) शुरू किया।
- नमक सत्याग्रह का मार्ग प्रशस्त हुआ।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| अधिवेशन | लाहौर अधिवेशन |
| वर्ष | 1929 |
| अध्यक्ष | जवाहरलाल नेहरू |
| स्थान | रावी नदी तट, लाहौर |
| मुख्य प्रस्ताव | पूर्ण स्वराज |
| स्वतंत्रता दिवस | 26 जनवरी 1930 |
निष्कर्ष
1929 का लाहौर अधिवेशन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का टर्निंग पॉइंट था। इसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को स्पष्ट रूप से पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ाया। रावी नदी के तट पर लिया गया यह ऐतिहासिक निर्णय ही आगे चलकर भारत की आज़ादी की मजबूत नींव बना।
FAQ (Yoast SEO ke liye helpful)
1929 के लाहौर अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की थी?
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने।
पूर्ण स्वराज प्रस्ताव कब पारित हुआ?
दिसंबर 1929 में लाहौर अधिवेशन में।
26 जनवरी 1930 को क्या हुआ था?
पूरे भारत में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया और पूर्ण स्वराज की शपथ ली गई।
लाहौर अधिवेशन का सबसे बड़ा महत्व क्या था?
इसने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता को कांग्रेस का आधिकारिक लक्ष्य बना दिया।